ध्यान, निर्वाण, शंकराचार्य, वैराग्य
सोच और प्रेरणा

निर्वाण षट्कम: एक अद्भुत यात्रा

जब भी ध्यान और आत्मा की बात होती है, आदि शंकराचार्य का नाम सबसे पहले आता है। उनकी रचना, निर्वाण षट्कम, एक ऐसी कृति है जो हमें एक अद्भुत आध्यात्मिक यात्रा पर ले जाती है। यह रचना न केवल वैराग्य की गहराई में डूबने का मौका देती है, बल्कि हमें अपने भीतर की शांति की खोज करने के लिए प्रेरित करती है। 🌸

निर्वाण षट्कम का अर्थ

निर्वाण षट्कम का मूल भाव वैराग्य है। यह शास्त्र हमें यह सिखाता है कि असली सुख बाहरी चीजों में नहीं, बल्कि हमारे भीतर की शांति में है। इस रचना में शंकराचार्य ने अपने शब्दों के माध्यम से यह समझाया है कि हम कौन हैं और हमारे अस्तित्व का क्या अर्थ है।

मुख्य श्लोक

निर्वाण षट्कम के कुछ प्रमुख श्लोक इस प्रकार हैं:

  1. नमामीशमीशान निर्वाणरूपं - यह श्लोक हमें ब्रह्म और आत्मा के एकत्व का अनुभव कराता है।
  2. न च प्राण-संज्ञो न वै पञ्च-वायु: - यहां शंकराचार्य यह बताते हैं कि हमारा अस्तित्व केवल भौतिक रूप में नहीं है।
  3. न मे द्वेष-रागौ न मे लोभ-मोहौ - यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि हमें अपनी इच्छाओं और मोह से ऊपर उठना चाहिए।
  4. चिदानंद-रूपं शिवो-हं शिवो-हं - यह हमारे आत्मा की शुद्धता और आनंद का प्रतीक है।

निर्वाण षट्कम का महत्व

यह रचना न केवल श्रोताओं को भावुक करती है, बल्कि उनके मन में गहरी सोच और ध्यान की प्रेरणा भी जगाती है। कई लोग जो ईशा योग केंद्र में इसे सुनते हैं, उनकी आंखों में आंसू आ जाते हैं। यह एक अद्भुत अनुभव है, जो हमें अपने भीतर की आवाज़ सुनने के लिए प्रेरित करता है। ✨

कैसे करें इसका अभ्यास?

निर्वाण षट्कम का अभ्यास करना बेहद सरल है। बस आपको एक शांत स्थान पर बैठना है, अपनी आंखें बंद करनी हैं, और इस मंत्र का उच्चारण करना है। धीरे-धीरे आप महसूस करेंगे कि आपके भीतर की हलचल शांत हो रही है और आप एक गहरी शांति की ओर बढ़ रहे हैं।

निष्कर्ष

निर्वाण षट्कम केवल एक रचना नहीं है, बल्कि यह एक जीवनदर्शन है। यह हमें सिखाता है कि असली सुख क्या है और हमें किस दिशा में बढ़ना चाहिए। इसलिए, अगली बार जब आप तनाव महसूस करें, तो थोड़ी देर के लिए इसे सुनें और अपने भीतर की शांति को खोजें। 🌼


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